प्लास्टिक कचरे से उपयोगी उत्पाद बनाने की नई तकनीक

सुंदरराजन पद्मनाभन

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नई दिल्ली, 14 जून  : भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(आईआईटी), रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसका उपयोगआम लोग भी प्लास्टिक कचरे से ईंट तथा टाइल जैसे उपयोगी उत्पाद बनाने में कर सकते हैं।

इस तकनीक को विकसित करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार, पॉलिमर तत्व एचडीपीई या उच्च घनत्व वाली पॉलीथीन सामग्री, कुछ रेशेदार तत्वों और संस्थान द्वारा विकसित किए गए खास तरह के रसायन के उपयोग से इस तरह के उत्पादों का निर्माण किया जा सकेगा।

प्लास्टिक कचरे, टूटी-फूटी प्लास्टिक की बाल्टियों, पाइप, बोतल और बेकार हो चुके मोबाइल कवर इत्यादि के उपयोग से इस तरह के उत्पाद बना सकते हैं। रेशेदार तत्वों के रूप में गेहूं, धान या मक्के की भूसी, जूट और नारियल के छिलकों का उपयोग किया जा सकता है।

आईआईटी, रुड़की के रसायन अभियांत्रिकी विभाग के वैज्ञानिक डॉ शिशिर सिन्हा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “यह बेहद आसान तकनीक है, जिसका उपयोग सामान्य लोग भी कर सकते हैं। इसके लिए प्लास्टिक, रेशेदार सामग्री और रसायन के मिश्रण को 110 से 140 डिग्री पर गर्म किया जाता है और फिर उसे ठंडा होने के लिए छोड़ देते हैं। इस तरह एक बेहतरीन टाइल या फिर ईंट तैयार हो जाती है।”

शोध समूह द्वारा विकसित रसायन ओलेफिन पर आधारित एक जैविक रसायन है। यह कंपोजिट बनाने के लिए पॉलिमर और रेशेदार या फाइबर सामग्री को बांधने में मदद करता है। डॉ सिन्हा के अनुसार, “इस रसायन को घरेलू सामग्री के उपयोग से बनाया जा सकता है। 50 से 100 ग्राम रसायन बनाने का खर्च करीब 50 रुपये आता है। महज 100 रुपये के खर्च में प्लास्टिक कचरे के उपयोग से एक वर्गफीट की 10 टाइलें बनाई जा सकती हैं। यह तकनीक ग्रामीण लोगों के लिए खासतौर पर फायदेमंद हो सकती है। इस रसायन पर पेंटेट मिलने के बाद इसके फॉर्मूला के बारे खुलासा किया जाएगा।”

डॉ सिन्हा के मुताबिक, “हमारी कोशिशइस कंपोजिट में इन्सान के बालों का उपयोग रेशेदार तत्व के रूप में करने की है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में अत्यंत गरीब व्यक्ति भी बालों की व्यवस्था कर सकता है।बाल यहां वहां पड़े रहते हैं और कई बार जल-निकासी को बाधित करते हैं। बालों में लचीलापन और मजबूती दोनों होती है। हल्का होने के साथ-साथ येजैविक रूप से अपघटित भी हो सकते हैं। कंपोजिट में बालों के उपयोग से संक्षारण प्रतिरोधी उत्पाद बनाए जा सकते हैं।”

(इंडिया साइंस वायर)

भाषांतरण : उमाशंकर मिश्र 

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