eDNA से निलस्सोनिया निग्रिकैन्स की मौजूदगी का चला पता

क्याः लिस्साोनिया निग्रिकैन्स कछुआ
कहांः असम नागशंकर तालाब
कैसेः eDNA

  • किसी जलीय प्रजाति को पता लगाने में इन दिनों ‘पर्यावरणीय-डीएनए तकनीक (environmental DNA: eDNA) काफी प्रभावी सिद्ध हो रही हे।
  • निलस्सोनिया निग्रिकैन्स या ब्लैक सॉफ्रटशेल कछुआ (Nilssonia nigricans or Black Softshell turtle) को आईयूसीएन लाल सूची में जंगलों में विलुप्त घोषित कर दिया गया था। परंतु असम के पवित्र नागशंकर तालाब में उपर्युक्त प्रौद्योगिकी का उपयोग कर इस प्रजाति की उपस्थिति का पता लगाया गया है।
  • असम में इस तालाब को पवित्र माना जाता है जिस कारण से वहां वैज्ञानिक को पूर्ण शोध की अनुमति नहीं दी गई थी। इसलिए ईडीएनए तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
  • इस तालाब में एन- निग्रिकैंस के अलावा निलस्सोनिया गैंगेटिक या इंडियन सॉफ्टशेल कछुआ (वल्नरेबल) (Nilssonia gangetica or Indian softshell turtle) और चित्र इंडिका या दक्षिण एशियाई तंग सिर वाला सॉफ्टशेल कछुआ (Chitra indica or South Asian narrow-headed softshell turtle) भी पाया गया है जिसे आईयूसीएन संकटापन्न के रूप में वर्गीकृत किया हुआ है।

क्या है ईडीएनए तकनीक?

  • जल में जीवों के सर्वेक्षण में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
  • यह आण्विक या माइटोकॉण्ड्रियल डीएनए है जो किसी जीव द्वारा पर्यावरण में छोड़ा जाता है। इनमें शामिल हैं मल, त्वचा, बाल, मृत शरीर, बलगम, युग्मक इत्यादि। ये तालाब जल में 7 से 21 दिन विद्यमान रहते हैं।

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