मेघालय में ‘रैट होल माइनिंग’ व प्रभाव

  • मेघालय में पहाड़ों में छोटे-छोटे प्रवेश के द्वारा कोयला खनन किया जाता है। चूंकि कोयला खनने के लिए पहाड़ों में 2 फीट चौड़ा छिद्र किया जाता है, इसलिए मेघालय में इसे ‘रैल होल’ (‘rat hole’) खनन की संज्ञा दी जाती है।
  • 13 दिसंबर, 2018 से ही 13 खनिक मेघालय के पूर्वी जयंतिया पहाड़ी के क्सान क्षेत्र के ऐसे ही रैट होल फंसे हुए हैं।
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 17 अप्रैल, 2014 को मेघालय में रैट होल माइनिंग पर प्रतिबंध लगा दिया था, हालांकि पहले से खनन कर लिए कोयला के परिहवन की अनुमति जरूर दे दी थी। एनजीटी का यह निर्णय 6 जुलाई, 2012 को मेघालय के नेंगकोल खान में 15 खनिकों की मृत्यु के पश्चात आई।
  • कई पर्यावरणविदों ने अवैध रैट होल माइनिंग के कारण आसपास के पर्यावरण व खेतों पर भी इसके दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका जतायी है। खेतों में अम्लीयता बढ़ने की संभावना जतायी गई है जिससे कृषि पर असर पड़ा है। यहां तक कि जल स्रोतों के भी प्रदूषित होने की खबरे छपती रहती हैं।
  • मेघालय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कोयला खानों तथा सीमेंट कारखानों से निकले अपशिष्टों को राज्य की लुखा एवं लुनार नदियों के सूखने की वजह बताया है।

क्या है रैट होल माइनिंग?

  • सामान्य तौर पर कोयला खनन हेतु सुरंग बनाई जाती है जिसे स्तंभों का सहारा दिया जाता है। परंतु मेघालय में अत्यधिक पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण इस तरह का सुरंग बनाना संभव नहीं है। साथ ही कोयले में सल्फर की उच्च मात्र के कारण उच्च गुणवत्ता के कोयला नहीं मिलते। इस वजह से अवैध रूप से छोटे-छोटे छिद्र बनाकर कोयला का खनन किया जाता है। इन्हें रैट होल कहा जाता है। ये तकरीबन 3 से 4 फीट ऊंचे होते हैं।
  • रैट होल दो तरीके से बनाए जाते हैंः साइड कटिंग प्रक्रिया एवं बॉक्स कटिंग प्रक्रिया। साइड कटिंग प्रक्रिया में पहाडि़यों के ढ़लान पर सुरंगें बनाई जाती हैं जिससे होकर श्रमिक कोयला परत तक पहुंचते हैं। मेघालय की पहाडि़यों में कोयला परत महज 2 मीटर से कम भी कम के हैं। वहीं बॉक्स कटिंग प्रक्रिया में 10 से 100 वर्ग मीटर का चौकोर प्रवेश बनाया जाता है। इसके पश्चात 100 से 400 फीट का वर्टिकल गड्ढ़ा खोदा जाता है। चूंकि रैट होल छिद्र काफी छोटे होते हैं इसलिए बच्चों को उसमें भेजा जाता है।

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