बच्चों को कुपोषण से बचा सकती है शिक्षित मां

 

  • शुभ्रता मिश्रा (Twitter handle : @shubhrataravi)

वास्को-द-गामा (गोवा), 22 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): कुपोषण को दूर करने के लिए भोजन की गुणवत्ता और आहार की मात्रा पर ध्यान देना जरूरी माना जाता है। लेकिन, एक नए अध्ययन में पता चला है कि बच्चों को पर्याप्त पोषण और विविधतापूर्ण आहार देने में शिक्षित मां की भूमिका परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि पारिवारिक आय और मां के शैक्षणिक स्तर का सीधा असर बच्चों को दिए जाने वाले पोषण की मात्रा और आहार विविधता पर पड़ता है। बच्चों को दिए जाने वाले आहार में विविधता बहुत कमपायी गई है।जबकि, आहार की अपर्याप्त मात्रा का प्रतिशत अधिक देखा गया है। शिशुआहार में कद्दू, गाजर, हरे पत्ते वाली सब्जियां, मांस, मछली, फलियां और मेवे जैसे अधिक पोषण युक्त आहार पर्याप्त मात्रा में शामिल करने में मां के शैक्षणिक स्तर का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। जबकि, घरेलू आर्थिक स्थिति का संबंध दुग्ध उत्पादों के उपभोग पर अधिक देखा गया है।

आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवारों में शिशुओं के लिए डिब्बाबंद खाद्य उत्पादों का उपयोगअधिक होता है। जूस, रेडीमेड शिशुआहार और योगर्ट जैसे खाद्य उत्पादों का उपयोग गरीब परिवारों की तुलना में अमीर परिवारों में लगभग चार गुना अधिक होता है। वहीं, शिक्षित माताओं के कारण रेडीमेड शिशु आहार चारगुना, जूस और योगर्ट तीनगुना तथा मछलियों, सूप और दुग्ध उत्पाद दो गुना अधिक उपयोग किए जाते हैं।

नई दिल्ली स्थित टाटा ट्रस्ट्स व आर्थिक विकास संस्थान और अमेरिकी शोधकर्ताओ द्वारासंयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन में विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक स्तरों पर बच्चों को दिए जाने वाले आहार की पर्याप्त मात्रा और विविधता को बच्चों के कुपोषण से जुड़ा प्रमुख कारक माना गया है।शोधकर्ताओं ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों के आधार पर 6-23 माह के लगभग 74 हजार बच्चों में भोजन सामग्री के उपयोग और आहार विविधता का आकलन किया है।

हारवर्ड यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ शोधकर्ता प्रोफेसर एस.वी. सुब्रमण्यन का मानना है कि भारत में बच्चों के पोषण के लिए जरूरी विविधतापूर्ण आहार की कमी एक आम समस्या है जो सिर्फ गरीब आबादी तक सीमित नहीं है।गरीब परिवारों मेंआहार में विविधता की कमी का कारण गुणवत्तापूर्णखाद्य पदार्थों को खरीदने और उनका उपभोग करने में सक्षम न होने की कठिनाई हो सकती है। जबकि,आर्थिक रूप से समृद्ध परिवारों में इस कमी का कारण जागरूकता के अभाव को दर्शाता है।

प्रोफेसर एस.वी. सुब्रमण्यन और डॉ. सुतपा अग्रवाल

इस अध्ययन से जुड़ीं प्रमुख शोधकर्ता डॉ. सुतपा अग्रवाल ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “केवल मां याअभिभावकों की शिक्षा का स्तर ही बच्चों को पौष्टिक भोजन खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। भारत में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए व्यापक रूप से जागरूकताअभियान चलाकर आहार और पोषक तत्वों से संबंधित सटीक जानकारी देना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके साथ ही, बच्चों में पौष्टिक भोजन के उपभोग और विविधतापूर्ण आहार सेवन में सुधार के लिए बनाए गए मॉडलों को सार्वभौमिक रूप से लागू किए जाने की आवश्यकता है।”

अध्ययनकर्ताओं के अनुसार,भारत में कद्दू, गाजर, हरे पत्ते वाली सब्जियों जैसे अपेक्षाकृत सस्ते खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करके खाद्य उत्पादों कीविविधता को बढ़ाया जा सकता है। इस शोध के नतीजे बच्चों में कुपोषण से निपटने के लिए व्यापक रणनीति बनाने में मददगार हो सकते हैं।

यह शोध यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लीनिकल न्यूट्रीशन में प्रकाशित किया गया है। इससे जुड़े शोधकर्ताओं में टाटा ट्रस्ट्सकी सुतपा अग्रवाल, राजन शंकर एवं स्मृति शर्मा, इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ, नई दिल्ली के विलियम जो, अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटीके रॉकली किम, चेन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, बोस्टन के जैवेल गौसमान और एस.वी. सुब्रमण्यन शामिल थे। (इंडिया साइंस वायर)

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